Sunday, September 22, 2013

ख्वाबों की कोई सीमा नहीं थी..

ख्वाबों की कोई सीमा नहीं थी
नींद की बस यही बात मुझे अच्छी लगी थी
छू सकता था हर उस एहसास को
खुली आँखों में जिनसे ख्वाइश डरने लगी थी
भूल जाता शायद किस्मत मानकर
पर नींद ने ख्वाबों का दामन ही नहीं छोड़ा 
बेमाने से लगे मुझे कितनी बार वो 
पर दिल ने उनको पाने का होंसला नहीं छोड़ा
थक गया था जितना भी दिन भर में
नींद के बाद मानो हर मायूसी ढलने लगी थी
ख्वाबों की कोई ...
ख्वाबों की तरफ जितना दौड़ा
नींद भी उतनी ही कम और गहरी होती गई
फर्क था हकीकत और ख्वाब में
नींद ख़ुद  ही वो फासला बनाती चली गई
नींद न आना उसकी नाराजगी नहीं
वक़्त के साथ दोस्ती उस से बढ़ने लगी थी
ख्वाबों की कोई ...

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