Monday, April 13, 2009

नफ़रत की आग

कहते है ख़ुद को हिन्दू और मुसलमान हम, जानवर भी हमसे अच्छा रहता है।
क्या मिल जायेगा उस मन्दिर या मस्जिद को खड़ा कर, जो लाशों के ढ़ेर पर बनता है।।
जला रहे आज जिंदा लोगों को, नफ़रत की आग में इन्सानियत जल रही।
हो रहे बच्चे अनाथ, औरतें विधवा, और कितनी माँ की गौद उजड़ रही।।
हर तरफ़ भुखमरी, हर तरफ़ तबाही, हर तरफ़ खून की नदियाँ बह रही।
खरीद रहे खंजर और बंदूक हम, भूखे को खिलाने के लिए न रोटी रही।।
रोता होगा खुदा और भगवान आज, राम और अल्लाह के नाम पर जंग हो रही।
जीत न हिन्दू की और न मुसलमान की, आज हार बस इन्सानियत की हो रही।।
देखते है तमाशा बैठ घर में, बाहर कितने मासूम बच्चे और औरतें जल रही।
बंद हो गए चूल्हे कितने घर के, माँ अब भी अपने बच्चों की राह तक रही।।
ना देखता कोई जाकर उन मासूमों को, रो- रोकर जिनकी आँखें भी सूख गई।
ना लगाता कोई मरहम उन बेबसों के जख्मों पर, जिनकी हर उम्मीद टूट गई।।
क्या फायदा उस हिन्दू या मुसलमान होने का, जहाँ ना है दया, धर्म के नाम पर ये सब होता है।
अच्छा हूँ बस एक इन्सान ही, जिसके दिल में खुदा और भगवान, देखकर दूसरे का दर्द रो देता है ।।

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